Friday, July 1, 2022
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दीपावली की वह रहस्यमयी रात भाग-03

 
ज़मीन में धंसे लकड़ी के कुंदे पर दीपक जल रहा था। कौन जला गया था ?–मैं जान न सका। आया था तब दीपक नहीं था कुंदे पर। दीपक की रौशनी अनुमान से अधिक थी जिसकी चमक में साधु को अच्छी तरह से देखा मैंने– छः फ़ीट लम्बा, पुष्ट, शक्तिशाली शरीर, गहरा सांवला रंग, बाल कन्धों तक बिखरे हुए। पहले से अधिक भयभीत हो उठा मैं।
गम्भीर स्वर में साधु बोला– मेरे साथ आओ।
मैं विवशता का अनुभव करने लगा था। लेकिन उसके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि उसकी आज्ञा को टाल न सका मैं। मन्दिर का इलाक़ा पार कर साधु एक बड़े से बरगद के पेड़ के पास आया। पेड़ के नीचे पत्थर का एक चबूतरा था। उसी चबूतरे पर बैठते हुए उसने गम्भीर स्वर में मुझे भी वहीँ बैठने का आदेश दिया। हिचकिचाते हुए बैठ गया मैं और फिर विनतीभरे स्वर में बोला मैं–महाराज ! मुझे जरा जल्दी है। घर में मेरी पत्नी है। त्यौहार का दिन है। मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी वह।
उसने जैसे मेरी बात सुनी ही नहीं। गम्भीर स्वर में बोला–तुम काली के उपासक हो न ! तुमको दीवान आनंद नारायण ने भेजा है। उनसे कब मिले थे तुम ?
यह सुनकर एकबारगी मेरा सिर चकरा गया। हकलाते हुए बोला–महराज ! मैं काली का उपासक अवश्य हूँ लेकिन किसी दीवान आनंद नारायण को मैं नहीं जानता।
साधु क्षुब्ध हो गया। कर्कश स्वर में बोला–काशीराज के दीवान आनंद नारायण को तुम नहीं जानते !
महाराज ! आप नाराज मत होइए। यह बतलाइये कि आप किस काशीराज की बात कर रहे हैं ? बनारस में तो किसी राजा का शासन नहीं है।
अपना हाथ चबूतरे पर पटकते हुए साधु बोला–अरे मूर्ख ! मैं महाराज चेत सिंह की बात कर रहा हूँ।
चेत सिंह….राजा चेत सिंह ! हाँ..हाँ , आपने ठीक कहा। काशी का राजवंश, जब वारेन हेस्टिंग्स ने चेत सिंह पर पांच लाख का जुर्माना किया था और महल की तलाशी ली थी। इतना ही नहीं, रानियों का अपमान भी किया था उसने। परिणाम यह हुआ कि काशी की जनता एकबारगी भड़क उठी और रईस गुंडों ने संभाल ली थी अपनी लाठियां और वारेन हेस्टिंग्स को अपनी जान बचा कर कशी से भागना पड़ा था। इतिहास का यह अति महत्वपूर्ण पृष्ठ समझा जाता है। मन-ही-मन सोचने लगा यह भयानक तांत्रिक चेत सिंह के समय की बातें क्यों कर रहा है ? लगता है जैसे उसी ज़माने में हो और जी रहा है उसी काल में वह।
मैंने कहा– महाराज ! राजा चेत सिंह से भली भांति परिचित हूँ मैं। लेकिन यह तो काफी पुरानी बात है और है– एक ऐतिहासिक घटना भी काशी की।
अरे दुष्ट ! यह तू क्या बक रहा है ?–झल्ला कर तांत्रिक ने कहा–महाराज चेत सिंह को तो ग्वालियर गए अभी कुछ ही साल हुए हैं। अभी उनके वंश का एक युवक गद्दी पर विराजमान है। अंग्रेजों की उसके सामने कुछ न चली और तू कहता है यह सब इतिहास की बात है !
वह विकट तांत्रिक कुछ पागल-सा लगा मुझे। जरा कड़े स्वर में मैंने कहा–क्षमा करें महाराज ! अब तो अंग्रेज भी अपने देश से चले गए। अब अपने देश में अपना ही राज्य है, यानी प्रजातंत्र है। राजा नहीं है कोई। राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री ही सर्वेसर्वा हैं। क्या आप दीर्घकाल तक समाधी लगाये रहे ?
अच्छा यह बताओ कौन-सा सन् चल रहा है ?
यह तो सन् 1949 ई. है।
झूठ..गलत बतला रहे हो। यह सन् 1796 ई. है–तांत्रिक जोर से बोला–तुम भी ठीक कहते हो। अब बात स्पष्ट हो गयी। तुम जिस काल में हो, वह सन् 1949 ई. का काल है। समझे वत्स ? तुम महामाया की प्रेरणा से यहाँ इस काल में उपस्थित हो। निश्चय ही साधना सफल होगी–इसमें सन्देह नहीं।
मेरा चकराना आवश्यक था। धीरे से पूछा–कैसी साधना ? क्या कह रहे हैं महाराज आप ?
ठीक कह रहा हूँ मैं। यह है महाराज चेत सिंह के समय का शासन काल 1797 ई.। सर जान शोर अभी गवर्नर हैं। राजा चेत सिंह के समय जो दीवान था, वह आनंद नारायण ही अभी भी दीवानी संभाल रहा है। वह मेरा परम शिष्य है। तुम आश्चर्यचकित क्यों हो बेटे ! ध्यान से सुनो और समझो मेरी बात। सन् 1770 ई. में ‘त्रिकाल सिद्धि’ के लिए कठोर तांत्रिक साधना माँ काली के सम्मुख प्रारम्भ की थी मैंने।
कृपया मुझे बतलाइये महाराज ! यह ‘त्रिकाल सिद्धि’ क्या होती है ?
बड़े ही जड़ युवक हो तुम। तंत्र की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण सिद्धि है यह। त्रिकाल सिद्धि होने पर साधक इच्छानुसार सशरीर भूत, भविष्य और वर्तमान–तीनों में से किसी भी काल में प्रवेश कर सकता है। वह हज़ारों वर्ष पीछे अतीत में जा सकता है और इसी प्रकार भविष्य में भी। त्रेता, द्वापुर आदि किसी भी युग में पदार्पण कर सकता है वह।
मुझे तो यह सब असम्भव- सा प्रतीत होता है महाराज !
मेरी बात सुनकर वह भयंकर तांत्रिक खूब ज़ोर से हंसा। फिर बोला–जिसे तुम लोग असम्भव समझते हो और जिसे वैज्ञानिक लोग समझते है कपोल कल्पना, उसे हमारे देश के सिद्ध साधकों ने कभी का योग और तंत्र-बल से सिद्ध कर रखा है। अब रही मेरी बात, मैंने भी घोर योगतांत्रिक साधना की और अपनी साधना को सफल बनाने के लिए प्रारम्भ में मैंने नर-बलि भी दी।
नरबलि !–यह सुनकर मेरा घबराना स्वाभाविक था।
हाँ, योगतांत्रिक साधना- भूमि में एक ऐसी अवस्था आती है जब महामाया पराशक्ति के सम्मुख नर-बलि देना आवश्यक हो जाता है। उससे जो पुण्यलाभ होता है, वह साधक के लिए आगे के साधना-पथ में सहायक सिद्ध होता है।
यह पुण्यलाभ क्या है ?
क्रमशः—
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